तबलीगी जमात की घटना आपराधिक कृत्य, मुसलमानों को भी इसके खिलाफ खड़ा होना होगा

नई दिल्ली। भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में सामने आया था और अभी भारत में कोरोना का यह आकड़ा 10 हजार पार कर गया है। जिसमें 339 लोगों की मौत भी हो चुकी है। कोरोना को देखते हुए भारत में लागू लाॅकडाउन को अब 3 मई तक बढ़ा दिया है। लाॅकडाउन का सकारात्मक असर भी देखने को मिला था, लेकिन तबलीगी जमात का मामला सामने आने के बाद एका एक ही देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ती गई। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 31 मार्च तक देश में कोरोना से संंक्रमित लोगों की संख्या केवल 1397 थी, जिसमें 35 मौते हुई थीं। लेकिन अब समाज के वर्ग का यह सबब भारत में परेशानी का सबब बनता जा रहा है। जहां पूरा देश कोरोना के खिलाफ इस जंग में साथ मिलकर लड़ रहा है वहीं कुछ लोगों की गलती के कारण आज यह स्थिति हो गई है कि आकड़ा 10 हजार को पार कर गया है। निश्चित ही तबलीगी जमात के इस कृत्य को किसी भी तरीके से सही नहीं ठहराया जा सकता।

देश के ज्यादातर हिस्सों में कोरोना संक्रमितों में शामिल तबलीगी जमात के ही लोग शमिल हैं। दिल्ली के ही ताजा आकड़ों की बात करें तो बीते सोमवार को दिल्ली में  एक दिन में ही 356 नए कोरोना संक्रमित मरीज पाए गए। जबकि चार लोगों ने इलाज के दौरान ही दम तोड़ दिया। इन मरीजों में से 325 मरीज जमाती हैं। इन सभी जमातियों को मरकज से निकालने के बाद क्वारंटीन केंद्रों में रखा गया था।

देश में 34% जमाती मरीज
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 14 अप्रैल दोपहर 12 बजे तक जो आंकड़े सामने आए हैं, उस हिसाब से देश में कुल सामने आए कोरोना के मरीजों में से 34 प्रतिशत मरीज तबलीगी जमात के हैं। यानी देश में 10, 435 केसों में से 3,532 मरीज तबलीगी जमात के हैं। वहीं अगर राज्यों के स्तर पर देखें तो सबसे ज्यादा जमात के मरीज दिल्ली में हैं। दिल्ली में 1,071 मरीज, तमिलनाडू में 881, तेलंगाना में 390, उत्तर प्रदेश में 390 तो आंध्रप्रदेश में 320 मरीज तबलीगी जमात के हैं।

तबलीगी जमात से जुड़े लोगों के कारण किस तरह कोरोना के मामलों में तेजी आई इसके तमाम आकड़े सामने हैं, उन्होंने किस तहर डॅाक्टरों के साथ अभ्रद व्यवहार किया यह भी सामने है। लेकिन इन सब के बावजूद कुछ लोग जमातियों की आड़ में मुसलमानों को टारगेट करने की बात कर रहें हैं, उन्हें जमातियों के कृत्य में कोई गलती नजर नहीं आ रही। 
द प्रिंट में एक लेख छपा है जिसका शीर्षक है, ‘कोविड के बहाने अब मुसलमानों को इनफाॅर्मल सेक्टर से निकाला जाएगा,रंगभेद अगला कदम होगा।’ इसके जवाब में Firstpost में जवाब देते हुए राजा मुनीब ने लिखा है, मुस्लिम को विकटिम कार्ड पहले भी बनाया जाता रहा है। कुछ लोगों के द्वारा अपने समुदाय द्वारा किए गए गलत कृत्य को ढकने की पहले भी कोशिश की जाती रही है। आगे मुनीब लिखते हुए कहते हैं, इस समय प्रत्येक मुसलमान को तबलीगी जमात के खिलाफ खड़ा होने और इस प्रकार के कृत्य की निंदा करने की जरूरत है। इससे समुदाय के बीच विश्वास मजबूत होगा। इस समय जरूरत है गलत को गलत कहने की।
दिल्ली में तब्लीगी जमात की घटना एक पूरी तरह से आपराधिक कृत्य थी, जिसने न केवल अपने सदस्यों के जीवन को खतरे में डाला,बल्कि देश भर में दूसरों के स्वास्थ्य को भी खतरे में डाल दिया है। यह ध्यान रखना उचित है कि तबलीगी जमात भारतीय मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं है और इस हरकत को मुस्लिम समुदाय के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। भारत में कई मुस्लिम सामाजिक संगठन अपने समुदाय के भीतर गलत प्रथाओं के आलोचक रहे हैं। ऐसे में पूरे मुस्लिम समुदाय को देशद्रोही कहना अन्यायपूर्ण है और हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
अपने लेख में मुनीब आगे लिखते हुए कहते हैं कि, भारत में मुसलमानों के पास एक प्रगतिशील राजनीतिक नेतृत्व का अभाव है जो उनका मार्गदर्शन और पोषण कर सके। यह देश में उच्च शिक्षा में मुसलमानों की हिस्सेदारी के आकड़ों से साफ हो जाता है।
अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में  2017-18 में केवल 5 प्रतिशत मुसलमानों ने उच्च शिक्षा हासिल की, जो समुदाय की कुल आबादी का लगभग 14 प्रतिशत है। इसके अलावा उच्च शिक्षा में मुस्लिम शिक्षकों की हिस्सेदारी केवल 4.9 प्रतिशत है। इसके अलावा,एक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तरी भारत में गैर-अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों में मुसलमानों का औसत नामांकन लगभग 1-3 प्रतिशत है।
ऐसे में सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व की अपेक्षा करना बेमानी होगी। जब तक राजनीतिक और सामुदायिक नेता शिक्षा को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक तबलीगी जमात जैसे संगठन फलते-फूलते रहेंगे।

तबलीगी जमात और उसके नेताओं को ज़िम्मेदार ठहराना केंद्र सरकार के लिए ज़रूरी है। साथ ही, भारत के मुसलमानों को ऐसे दुर्भावनापूर्ण संगठनों के खिलाफ एकजुट होना चाहिए, और शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में अधिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर एक साथ आना चाहिए।

 

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