कोरोना के खिलाफ संघर्ष में साधु संन्यासी देश के साथ

भारत पर जब भी कोई आपदा, संकट या संघर्ष नजर आया तब यहां के साधु सन्यासी राष्ट्र हित मे अपनी परंपराओं को तोड़ कर आगे आये। आज जब कोरोना का भी संकट देश के सामने है देश उससे जूझ रहा है। तो एक बार फिर से साधु- संत इस युद्ध में सरकार और समाज के साथ खड़े नजर आ रहे हैं और इस महायुद्ध में उनका पूरा सहयोग मिल रहा है।

देश में कोरोना के संक्रमण को देखते हुए 3 मई तक लॉक डाउन के दूसरे चरण का एलान हो चुका है। कोरोना की चेन को तोड़ने के लिए पूरे देश को स्थिर कर दिया गया है। लाखों लोग ऐसे भी हैं जो इस मुश्किल घड़ी में अपने-अपने घरों से सैकड़ों मील दूर रहने को मजबूर हैं । देश के लगभग एक करोड़ सन्यासियों के सामने भी कोरोना के चलते एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है । दरअसल बिना किसी आश्रय के रमते जोगी की तरह जीवन जीने वाले संन्यासियों को भी स्थिर होना पड़ा है। ऋषि परंपरा अनुसार ये लोग किसी एक स्थान पर स्थिर नही रह सकते, ये लोग अपना दैनिक भोजन भी रमते हुए ही भक्तो के पास से जुटाते हैं। आज भोजन मिले तो कल की चिंता नही। वो संन्यासी भी कोरोना संकट में देश की जरूरत की समझकर जंगलों में कंदराओं में और गुफाओं में रम गए है। ये लोग लोक डाउन के कारण स्वयं बस्ती में जाकर भोजन नहीं जुटा सकते ,इसलिए जंगल मे जो कुछ मिलता है उस पर ही आश्रित हैं। लेकिन इस सबके बावजूद इन संन्यासियों ने न किसी से भोजन की मांग की और ना ही कभी सरकार पर आरोप लगाए । ये लोग जंगलों और कंदराओं में रहकर आध्यात्म की अलख जगा रहे हैं लेकिन जैसे जैसे इन सन्यासियों का पता चल रहा है स्वयंसेवी संस्थाएं जंगलों में जाकर उनतक भोजन पहुंचा रही हैं।
चित्रकूट के जंगलों में और दुर्गम पहाड़ों में इस वक्त बड़ी संख्या में ऐसे ही साधु संन्यासियों ने डेरा डाल रखा है। इन साधु संन्यासियों के बारे में जैसे ही दीनदयाल शोध संस्थान को पता चला तो संस्थान के सचिव अभय महाजन बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को साथ लेकर इन साधु संतों को राशन उपलब्ध करवा रहे हैं। इस काम के लिए दीनदयाल शोध संस्थान के कार्यकर्ताओं को कई-कई किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। यहां तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है लेकिन घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ों और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और चट्टानी रास्तों को पार कर अभय महाजन और उनकी टीम इन संन्यासियों तक राशन लेकर पहुंच रहे हैं। दीन दयाल शोध संस्थान की तरफ से जिन आश्रमों में भोजन सामग्री पहुंचायी गयी उनमें टाटी घाट श्रम, और बांके सिद्ध आश्रम प्रमुख रूप से है। बांकेसिद्ध आश्रम के लिए तो संस्थान के कार्यकर्ताओं को राशन लेकर करीब 8 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। इसी तरह हनुमान धारा से करीब 7 किलोमीटर दूर बंदर चूही के घने जंगलों के बीच रह रहे संन्यासियों अभय महाजन और उनकी टीम भोजन सामग्री पहुंचाने में सफल रही।
साधु-संतों ने दिया जीत का आशीर्वाद
दीन दयाल शोध संस्थान के कार्यकर्ता जब राहत सामग्री लेकर जब इन ऋषियों के पास पहुंचे तो उन्होंने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जीत का आशीर्वाद दिया। वहीं दूसरी तरफ दुर्गम पहाड़ों को पार कर संन्यासियों की सेवा में पहुंचे कार्यकर्ताओं को जब घने जंगलों के बीच अपनी मंजिल मिली और कोरोना के खिलाफ युद्ध में संतों से आशीर्वाद मिला तो उनके चेहरे पर थकान की जगह परम संतोष और असीम आनंद का भाव था ।

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