भारत की जिस दवा की दुनिया भर में हो रही डिमांड, वो इस तहर बनकर होती है तैयार

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के फैलते जाने का एक सबसे बड़ा कारण है इसके इलाज का न होना। अभी दुनिया में इसकी वैक्सीन बनाने में काम चल रहा है लेकिन फिलहाल कोई सफलता नहीं मिली है।वहीं अब कोरोना के इलाज में भारत में बनने वाली दवा Hydroxychloroquine मददगार साबित हो सकती है। कोरोना से बचाव में इस 70 साल पुरानी मलेरिया विरोधी दवाई Hydroxychloroquine को खुद अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गेमचेंजर बताया था। जिसके बाद से पूरी दुनिया में इस दवाई की डिमांड बढ़ गई। इस दवाई का 70 फीसदी उत्पादन भारत करता है, भारत ने पहले इस दवा के निर्यात पर पाबंदी लगाई हुई थी लेकिन अमेरिका की डिमांड को देखते हुए भारत ने इस दवा के निर्यात पर पाबंदी हटा दी है। अमेरिका,  ब्राजील समेत कई देश भारत से इस दवा की आपूर्ति करने की मांग कर चुके हैं। दरअसल, जब से अमेरिकी डाक्टरों ने यह कहा है कि मलेरिया में इस्तेमाल होने वाली यह दवा कोरोना के इलाज के लिए कारगर है, तब से इसकी मांग बढ़ गई है।

in high demand globally, many countries have requested for it; considering domestic stock availability & our requirement, Group of Ministers decided to release some surplus stock for export. – @MEAIndia #IndiaFightsCorona https://t.co/X0iarmgEek

Financial express ने अपनी वेबसाइट पर एक खबर प्रकाशित की है जिसमें उसने लिखा है कि चीन की एक रिपोर्ट भी यह दावा करती है कि Hydroxychloroquine कोरोना के इलाज में कारगर है। उसमें लिखा है, चीन की एक रिपोर्ट का यह दावा है कि यह दवा 10 अस्पतालों में 100 से ज्यादा मरीजों के लिए कारगर रही। उनकी बीमारी का स्तर अलग-अलग था, लिहाजा दवा की डोज और हर डोज के बीच में अंतराल भी अलग-अलग था। चीन के कुछ अन्य रिसर्चर्स का कहना है कि Hydroxychloroquine लेने वाले 31 मरीजों में खांसी, न्यूमोनिया और बुखार इस दवा को न लेने वाले अन्य 31 मरीजों के मुकाबले जल्दी ठीक हो गया।

भारत में इस दवा का निर्माण Ipca Laboratories, Zydus Cadila और Wallace Pharmaceuticals जैसी कंपनियां करती हैं। कोरोना के इलाज में असरकारक यह दवा मध्यप्रदेश के रतलाम में इप्का लेबोरेटरी में बनाई जा रही है। मेडिसन का राॅ बेस मेटिरयल रतलाम में तैयार हो रहा है। जिसके बाद इसको अंतिम रूप सिक्किम प्लांट में दिया जाता है। इसके लिए रतलाम, इंदौर ,महाड़ और सिक्किम प्लांट में 4 हजार कर्मचारी 24 घंटे काम कर रहे हैं।

इस तरह बनकर होती है तैयार

इसके पहले चरण में इंदौर व महाड़ प्लांट में रासायनिक क्रिया के माध्यम से शुरुआती रॉ मटेरियल बनता है। जिसके बाद यह तीसरे स्टेज में फाइनल बेस रतलाम स्थित प्लांट में बनकर तैयार होता है। रतलाम में बने फाइनल बेस रॉ मटेरियल से सिक्किम प्लांट में टेबलेट बनाकर पैकिंग करके सप्लाई का जाती है।

बता दें कि केंद्रीय स्वास्थ्य एंव परिवार क्लयाण मंत्रालय ने हाल ही में IPCA और Zydus Cadia को HCQ की 10 करोड़ टैबलेट्स बनाने का ऑर्डर दिया है।

इंडियन फार्मास्यूटिकल अलांयस (IPA) के मेनिजिंग डायरेक्टर अजित जैन की माने तो भारत के पास अभी भी इतनी कैपेसिटी है वह एक महीने में 40 टन HCQ का निर्माण कर सकता है।

वहीं दुनिया में बढ़ती टेबलेट की मांग को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया था कि भारत के पास इसका प्रर्याप्त स्टॅाक उपलब्ध। भारत के पास अभी इतना स्टॉक मौजूद है कि वह एक महीने से ज्यादा लोगों को दवा उपलब्ध करवा सकता है। मंत्रालय ने बताया कि भारत के पास अभी भी 3 करोड़ से ज्यादा टैबलेट्स उपलब्ध है।

 

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