NDTV ने फिर फैलाया झूठ

नई दिल्ली। देश इस समय कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहा है। वहीं दुसरी और फेक न्यूज फैलाने वालों से भी। लोकतंत्र के चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया पर आज लोगों का भरोसा कम हुआ है। उसका कारण है गलत सूचनाओं और फेक न्यूज को फैलाना। एनडीटीवी भारत के पुराने मीडिया चैनल्स में से एक है। लेकिन आज एनडीटीवी पर फेक न्यूज फैलाने को लेकर कई आरोप लगे हैं। एक बार फिर इस चैनल पर फैक न्यूज फैलाने का आरोप लगा है। एनडीटीवी ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू दिखाया था, जिसमें प्रयागराज के रहने वाले फराज जैदी को यह कर संबोधित किया था कि फराज अमेरिका में उस टीम की अगुवाई कर रहे हैं, जो कोविड19 की वैक्सीन (टीका) बना रही है। लेकिन फराज जैदी की यह कहानी जो चैनल ने दिखाई वो झूठी है।

पाञ्चजन्य ने एनडीटीवी के इस झूठ का खुलासा किया है। पाञ्चजन्य ने अपनी रिर्पोट में लिखा है, पिछले दिनों एनडीटीवी इंडिया ने अमेरिका के एक तथाकथित भारतीय मूल के वैज्ञानिक का इंटरव्यू किया। बताया गया कि प्रयागराज के रहने वाले फ़राज़ ज़ैदी अमेरिका में उस टीम की अगुवाई कर रहे हैं जो कोविड19 का वैक्सीन (टीका) बना रही है। सुनने में लगेगा कि ये कोई बहुत बड़ी उपलब्धि है लेकिन जो सच्चाई सामने आ रही है वो कुछ और ही है। दरअसल एनडीटीवी ने ये पूरा झूठ गढ़ा था ताकि इसके नाम पर वो यह जता सके कि महामारी के इस समय में मुस्लिम समुदाय जो बर्ताव कर रहा है वो बिल्कुल उचित है। अगर वो महामारी फैला रहे हैं तो क्या हुआ, दवा भी तो ढूंढ रहे हैं।

आगे अपनी रिर्पोट में पाञ्चजन्य ने लिखा है, हमने इस बारे में अमेरिका में फिलाडेल्फिया के विस्तार इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों से जानकारी मांगी, तो पता चला कि फ़राज़ ज़ैदी वहां पर प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम करते हैं। प्रोजेक्ट मैनेजर कोई वैज्ञानिक पद नहीं है जो वैक्सीन की खोज कर रहा हो। यह एक तरह का कोऑर्डिनेटर या समन्वयक होता है, जो टीम में आपसी तालमेल का काम करता है। विस्टार इंस्टीट्यूट की वेबसाइट पर जाकर कोई भी देख सकता है कि फ़राज़ ज़ैदी नाम का यह व्यक्ति वहां पर वैज्ञानिक के तौर पर दर्ज नहीं है। डेविड बी वीनर नाम के वैज्ञानिक इस टीम की अगुवाई करते हैं। जबकि चैनल ने दावा किया कि ये टीम फ़राज़ ज़ैदी की है। संस्थान की वेबसाइट पर आप देखेंगे तो पता चलेगा कि प्रोजेक्ट के लीड साइंटिस्ट अमी पटेल नाम के एक भारतीय हैं। मानसी पुरवार नाम की एक अन्य भारतीय वैज्ञानिक इसी टीम का हिस्सा हैं। लेकिन एनडीटीवी ने ऐसे जताया मानो ये पूरी टीम फ़राज़ ज़ैदी ही चला रहे हों। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने अमी पटेल या मानसी पुरवार का नाम तक नहीं लिया। एनडीटीवी की फैलाई ये फ़र्ज़ी ख़बर देखते ही देखते दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत तमाम अख़बारों में भी पहुंच गई। भारत पहुंचाने से पहले इसे अमेरिका के कुछ ऐसी वेबसाइट पर भी पोस्ट कराया गया जो पैसे लेकर कुछ भी छापने को तैयार रहती हैं।

पाञ्चजन्य ने आगे सेकुलर पत्रकारों की पोल खोलते हुए लिखा है, समझना मुश्किल नहीं कि फ़राज़ ज़ैदी के मुसलमान होने के कारण एक नैरेटिव बनाने के लिए उनके नाम का इस्तेमाल किया गया।  कुछ दिन पहले सेकुलर पत्रकारों की इसी ब्रिगेड ने यह झूठ भी फैलाया था कि भारतीय दवा कंपनियों सिपला और वॉकहार्ट के मालिक मुसलमान हैं। जबकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सिपला के मालिक यूसुफ़ हामिद ख़ुद की मुस्लिम पहचान को ख़ारिज करते रहे हैं। बताया जाता है कि वो अपनी माँ के धर्म यहूदी से जुड़े हुए हैं। इसी तरह वॉकहार्ट के मालिक हबील खोराकीवाला को भी मुसलमान बताया गया, जबकि वो दाऊदी वोहरा हैं। जिन्हें सुन्नी और शिया मुसलमान अपने मज़हब का नहीं मानते। प्रश्न यह भी उठता है कि मीडिया का यह सेकुलर गिरोह आख़िर एक ख़ास मज़हब को मानवता का सेवक साबित करने के लिए इतना प्रयासरत क्यों है?

मीडिया का एक धड़ा आज इस मुश्किल के समय में भी अपना एंजेडा सेट करने में लगा है। अभी कुछ दिन पहले ही एनडीटीवी ने ये भी ख़बर चलाई कि अरुणाचल प्रदेश में लॉकडाउन के कारण स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि गरीबों को भोजन के लिए कोबरा मार कर खाना पड़ रहा है। बाद में यह खबर भी फर्जी निकली। इस फर्जी खबर की पोल खुद केंद्रीय मंत्री और नार्थ-ईस्ट भारत के लोकप्रिय नेता किरण रिजिजू ने खोली। उन्होंने बताया कि न सिर्फ वो बल्कि राज्य सरकार भी जानवरों के शिकार और उनकी हत्या को लेकर एकदम सख्त हैं। उन्होंने जानकारी दी कि राज्य में पर्याप्त मात्रा में अनाज उपलब्ध है, इसीलिए भोजन की कमी के चलते कोबरा को मार कर खाने वाली बात एकदम बेवकूफाना है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि अरुणाचल प्रदेश में कोई भी व्यक्ति खाने के लिए कोबरा का शिकार नहीं करता। एनडीटीवी को लताड़ते हुए किरण रिजिजू ने सलाह दी कि वो ऐसे लेख लिखने से पहले कम से कम उसकी पुष्टि तो कर ले।

 

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