जब मदद पाकर छलके बुजुर्ग महिला के आंसू, बदले में संघ के स्वयं सेवकों को दिया ढेर सारा आशीर्वाद

नई दिल्ली। कोरोना लॉकडाउन ने बहुत हद तक कई लोगों की सामान्य जीवन शैली को परेशान किया है। यहां तक कि यह कल्पना करना कठिन है कि गरीब, दिहाड़ी मजदूर कैसे इसका मुकाबला कर रहे हैं, हालांकि किसी को कॉरोना से लड़ने के लिए वर्तमान में उपलब्ध चीजों में सबसे अच्छी दवा लगती है।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ता कर्नाटक के बेलागवी जिले में जरूरतमंद के घर पहुंचे। घर पहुंचने पर देखा कि जिस घर वे पहुंचे थे वो घर पूरी तरह से जर्जर हालात में था। एक अजीब से दिखने वाली बुजुर्ग घर पर अकेली लग रही थी। स्वयंसेवकों ने बुजुर्ग को बुलाया। कई बार पुकारने के बाद वह बाहर आई। स्वयंसेवक द्वारा किराने की किट प्रदान की गई थी।
बुजुर्ग की आँखों में आँसू थे। उसने उम्मीद नहीं की थी कि लॉकडाउन के समय कोई भी उसे किराने देने के लिए घर आएगा। वह भूली नहीं थी कि पिछले साल भी परेशानी के समय में उसे संघ के लोगों ने मदद की थी। बाढ़ के समय में आकर आरएसएस ने ही इन्हें मदद की पेशकश की थी।
बुजुर्ग महिला ने स्वयंसेवकों को धन्यवाद दिया। स्वयंसेवक ये कहते हुए प्रतिक्रिया देने लगे कि सेवा कार्यों के लिए पैसा उसी समाज और संघ (आरएसएस) के लोगों का है, एक संगठन हमें जरूरतमंदों तक इसे पहुंचाने के लिए कहता है। इसलिए धन्यवाद के लिए अनिवार्य रूप से समाज और संघ के पास जाना चाहिए, न कि हमें जो समाज के खिलाफ ऐसी दुखद घटनाओं में केवल पैदल सैनिक हैं।
उन्होंने स्वयंसेवकों को आशीर्वाद दिया और यह भी कहा कि सुनिश्चित करें कि आप मेरे मरने पर मेरे पास हैं। मैं इसे एक वरदान के रूप में मानता हूं कि आप लोगों को मेरा अंतिम संस्कार करना है क्योंकि मुझे मोक्ष प्राप्त होना सुनिश्चित है।
ये शब्द संघ और उसके स्वयंसेवकों के लिए काफी भारी हैं, उन शब्दों को उस बूढ़ी औरत का आशीर्वाद माना जाता है, जिसे वास्तव में मदद की ज़रूरत थी और समाज ऐसे बड़े पैमाने पर सेवा कार्यों के लिए संघ को पैसे देने में सक्षम था।

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