कोरोना ने दिखाई पहाड़ के नौजवानों को नईं राह!

नई दिल्ली। कोरोना महामारी के चलते शहरों में जन जीवन ठप्प पड़ा है, सड़कें वीरान हैं तो बाजार सुनसान पड़े हैं बीमारी से बचने के लिये लोगों ने खुद को घरों में कैद कर रखा है। वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड में इसका एक सुखद पहलू भी देखने को मिल रहा है । सालों बाद गांवों में मानो फिर से रौनक लौट आयी है, बंजर हो चुके खेतों में फिर से हल चल रहे हैं, और सिंचाई के लिए नहरों और गूलों की मरम्मत हो रही है ।

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ऐसी ही कुछ तस्वीरें सामने आयी हैं पौड़ी के एक गांव गुराड़ तल्ला की। जहां 10 साल से बंजर पड़े खेतों में फिर से सिंचाई हो रही है। इस गांव के नवयुवकों ने ग्राम प्रधान के सहयोग से अपने खेतों में सब्जी उत्पादन की पहल शुरू की है। ये उत्तराखंड के उस जिले का सच है जहां पलायन की दर सबसे ज्यादा है।

दरअसल लॉक डाउन का बाद देश के बड़े शहरों से हजारों नौजवान वापस अपने घरों को लौट आये हैं। ये लोग अबतक रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई और चंडीगढ़ जैसी शहरों में काम कर रहे थे जिनके भेजे पैसों पर घर का खर्च चलता था।

अब इन लोगों को शहरों की असलियत और स्वरोजगार की अहमियत समझ में आ रही और बड़ी संख्या में लोग वापस खेती बाड़ी की तरफ मुड़ रहे हैं’ । जो युवक गांव लौट रहे हैं उनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्होंने नौकरी के लिये वापस शहर जाने का विचार त्याग दिया है  है। ये लोग अब गांव में रहकर खेती किसानी के जरिए स्वरोजगार में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।

स्थानीय निवासी संजय नेगी के मुताबिक इस तरह के कई उदाहरण इस दौर में देखने को मिल रहे हैं जब लोग वापस खेती किसानी में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। उत्तराखंड के गांवों में कई लोग सालों से फल और  सब्जी उत्पादन कर रहे हैं इनकी सफलता भी नौजवानों को प्रेरित कर रही है।पलायन के चलते उत्तराखंड के हजारों गांव हमेशा के लिए खाली हो चुके हैं।

जो गांव आबाद हैं उनमें भी सिर्फ महिलाएं बुजुर्ग और बच्चे और महिलाओं की संख्या ज्यादा है। जबकि नौजवान रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की तरफ रूख कर लेते हैं। ऐसे में पहाड़ों में खेती बाड़ी पूरी तरह से चौपट हो चुकी है। लेकिन कोरोना महामारी को उत्तराखंड के नौजवानों को एक सबक की तरह लिया है। इनमें से कई नौजवान ऐसे हैं जिन्होंने गांव में रहकर ही कुछ करने की ठान ली है। ये लोग अब सामूहिक खेती के जरिए अपने मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं।

लॉक डाउन में चमोली की महिलाओं ने दिखाया रास्ता

उत्तराखंड में हमेशा से नारी शक्ति ने ही रास्ता दिखाया है। चाहे वो शराब के खिलाफ नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन हो या फिर पेड़ों की कटाई के खिलाफ चिपको आंदोलन रहा हो या फिर अलग राज्य के लिए उत्तराखंड आंदोलन का संघर्ष रहा हो महिलाएं हमेशा सबसे आगे रही हैं। कोरोना काल में उत्तराखंड की महिलाओं ने फिर से उम्मीद की जगायी है। यहां के पोखरी विकासखंड के चमसील गांव की महिलाओं ने लॉक डाउन में निराश होकर घर बैठने के बजाय उसका फादा उठाया है। इस गांव की महिलाएं इन दिनों लॉक डाउन में सब्जी बेचकर मुनाफा कमा रही हैं। इस गांव की महिलाएं कुछ दिन में ही 18 हजार रुपये की सब्जी लोक मार्केट में बेच चुकी हैं। इस गांव की 12 महिलाओं ने सेवा इंटरनेशनल के सहयोग से गांव में सामूहिक खेती शुरू की थी।

इसी तरह पौड़ी जिले के विकासखंड कल्जीखाल में भी कई स्थानीय युवाओं और महिलाओं ने सामूहिक खेती के जरिए एक मिसाल पेश की है । यहां किसानों की मदद के लिए कल्पवृक्ष किसान संगठन भी मदद कर रहा है । इस संगठन के जरिए कल्जीखाल ब्लॉक के ग्राम पंचायत बिलखेत, ग्राम जखनोली, ग्राम पँचायत मरोड़ा, ग्राम चोपड़ा, ग्राम पंचायत बुंगा, ग्राम पँचायत सिला समेत कई गांवों में टमाटर, लौकी, खीरा, करेला, तोरी, बैंगन, शिमला मिर्च, हरी मिर्च आदि सब्जियों के सैकड़ों पौधे रोपित किये जा चुके हैं ।

नेपाली नागरिक बन चुके हैं मिसाल

एक सच ये भी है कि उत्तराखंड में बड़ी संख्या में नेपाली मजदूर सब्जी उत्पादन में लगे हुए हैं। जब उत्तराखंड के गांवों में लोग खेती को त्याग रहे हैं तब नेपाली नागरिकों ने गांवों में स्थानीय काश्तकारों से किराये पर जमीन लेकर सब्जी उगानी शुरू की। उत्तराखंड के दर्जनों गांवों में सैकड़ों नेपाली मजदूर इस समय सब्जी उत्पादन के काम में लगे हैं और अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।

2018 तक खाली हो चुके थे 1734 गांव

पलायन आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में 2018 तक 1734 ऐसे हैं जो खाली हो चुके हैं।  जबकि 400 गांव ऐसे हैं जहां 10 से भी कम लोग रहते हैं। इनमें से  सबसे ज्यादा पलायन पौड़ी जिले में हुआ है। पलायन आयोग के अनुसार साठ हजार से अधिक लोग अपने घरों की ओर लौटे हैं। इनमें से लगभग साठ प्रतिशत अब गांव में ही रहकर रोजगार की तलाश करना चाहते हैं।

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